ओवरव्यू

उत्श्रृखंल और दुर्दांत दामोदर नदी को नियंत्रित करने के लिए एक पूरी शताब्दी से भी अधिक समय में किये गये प्रयासों की प्रकाष्ठा के रूप में डीवीसी का प्रादुर्भाव हुआ । बाढ़ की विभिन्न तीव्रता ने बार-बार घाटी को क्षतिग्रस्त किया है । 1730, 1823, 1848, 1856, 1882, 1898, 1901, 1916, 1923, 1935 व 1943 में भयंकर बाढ़ आयीं । नदी बिहार (अब झारखंड) एवं पश्चिम बंगाल राज्यों को आवृत्त करते हुए 25,000 स्का. किमी के क्षेत्र में फैली है ।

 

1943 में बाढ़ ने भयंकर विनाश लीला दर्शायी जिसके कारण सरकार के विरुद्ध भयंकर जनाक्रोश देखने को मिला । परिणामस्वरूप, पश्चिम बंगाल सरकार ने “दामोदर बाढ़ जाँच समिति” शीर्षान्तर्गत एक बोर्ड का गठन किया । इस संबंधी निवारात्मक सुझाव के लिए सदस्य बतौर बर्द्धवान के महाराजा एवं विख्यात भौतिक शास्त्र विशेषज्ञ डॉ. मेघनाथ साहा का चयन किया गया ।

दामोदर घाटी जाँच समिति ने यू.एस.ए. में स्थापित टैनिसी वैली अथॉरिटी (टीवीए) के समनुरूप एक प्राधिकरण के सृजन का सुझाव दिया और 1.5 मिलियन एकड़ फीट (1,850 मिलियन क्यूबिक मीटर) की कुल क्षमता सहित स्थलों पर बांधों और भंडारण जलागारों के निर्माण की अनुशंसा के साथ ही घाटी क्षेत्र में बहूद्देशीय  विकास की संभावनाओं पर प्रकाश डाला । तब भारत सरकार ने प्रस्ताव के अध्ययन के लिए ‘केन्द्रीय तकनीकी विद्युत बोर्ड’ का गठन किया । साथ ही, टीवीए के एक वरिष्ठ अभियंता श्री डब्ल्यू.एल. वुर्दुइन को घाटी के व्यापक विकास हेतु अपनी अनुशंसा प्रदान करने और दामोदर की समस्या का अध्ययन करने के लिए नियुक्त किया । तदनुसार, अगस्त 1944 में श्री वुर्दुइन ने दामोदर घाटी के एकीकृत विकास पर अपना ‘प्राथमिक ज्ञापन’ प्रस्तुत किया ।

श्री वुर्दुइन के ‘प्राथमिक ज्ञापन’ ने दामोदर घाटी में बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, विद्युत उत्पादन और नौचालन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक बहूदेशीय विकास योजना अभिकल्पित करने का सुझाव दिया । भारत सरकार द्वारा नियुक्त चार परामर्शकों ने इसकी जाँच की । उन्होंने वुर्दुइन योजना की मुख्य तकनीकी विशेषताओं का अनुमोदन भी किया तथा पहले तिलैया से पहल शुरू कर मैथन तक निर्माण की अनुशंसा की ।

अप्रैल 1947 तक, योजना के क्रियान्वयन पर तीन सरकारों यथा; केन्द्र, पश्चिम बंगाल व बिहार के बीच एक पूर्ण करार व्यावहारिक तौर पर निष्पादित हुआ था और मार्च 1948 में, दामोदर घाटी निगम के निर्माण के उद्देश्य बतौर तीन सरकारों – केन्द्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार एवं बिहार (अब झारखंड) सरकार की अपेक्षा को ध्यान में रख कर केन्द्रीय विधान मंडल द्वारा दामोदर घाटी निगम अधिनियम (1948 का अधिनियम सं. XIV) पारित हुआ था ।

स्वतंत्र भारत की प्रथम बहूदेशीय नदी घाटी परियोजना के रूप में 7 जुलाई, 1948 को निगम अस्तित्व में आया ।