भू-संरक्षण

दामोदर घाटी में मृदा क्षरण की रोकथाम

 

दामोदर घाटी निगम हजारीबाग स्थित अपने भू-संरक्षण विभाग द्वारा बहु विषयी पहलों के साथ मृदा तथा जल संरक्षण/समेकित जल विभाजक प्रबंधन कार्यक्रमों के माध्यम से उच्च दामोदर-बराकर स्रवण क्षेत्र में भू-अपर्दन समस्याओं से निजात पाने के लिए 1949-50 से कार्य कर रहा है ।

 

कुल समस्याग्रस्त क्षेत्र जिसमें भू-संरक्षण कार्य की आवश्यकता है, वह 11.47 लाख हेक्टेयर है । इसमें से 5.328 लाख हेक्टेयर भू-संरक्षण क्रियाकलापों द्वारा आवृत्त है । फिर 7.27 लाख हेक्टेयर प्राथमिकता समस्या क्षेत्र में से, 73.29% पहले ही आवृत्त किया जा चुका है । आगामी वर्षों में बचे क्षेत्रों में कार्य शुरू कर दिया जाएगा।

भू-संरक्षण कार्य का उद्देश्य

  • जल विभाजक प्रबंधन द्वारा मृदा अपर्दन नियंत्रण
  • डीवीसी जलागारों में गादीकरण रोक
  • आर्द्र संरक्षण द्वारा आर्द्र क्षेत्र संवर्धन
  • निवासियों के लिए भोजन, फाइबर एवं ईंधन का उत्पादन संस्थापित करने के लिए मृदा उर्वरा बनाएँ रखना
  • जीवन रक्षण सिंचाई के रूप में जल उपयोग
  • भू-संरक्षण संरचना अभिकल्पन हेतु विश्वसनीय डाटा बेस उत्पादन
  • फसल उत्पादन सुनिश्चियन
  • प्रदूषण नियंत्रण उपायों के रूप में डीवीसी परियोजनाओं में और उसके चतुर्दिक हरित क्षेत्र सृजन
  • कृषि योग्य जल विभाजक को कृषि योग्य भूमि में परिवर्तन
  • सरकारी अधिकारियों, अभियंता छात्रों, इसको एवं जीओ आदि को प्रशिक्षण प्रदान करना

प्रचालनगत क्षेत्र

झारखण्ड पलामू, रांची, हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, बोकारो, संथाल परगना तथा दुमका जिला ।
पश्चिमबंगाल पुरूलिया जिला

भूमि भरण हेतु नियंत्रण उपाय

  • वनीकरण/सिल्वी पास्टोरल विकास/कंटूर ट्रेनचिंग/पुनर्वासन
  • खेत झाड़ी, चारागाह, बागवानी विकास, निकास लाइन उपचार, गादरोधी बांध, तालाब पुनरुद्धार, भूमि सुधार, फसलों पर प्रदर्शन, उर्वरक उपयोग, आर्द्रता संरक्षण
  • जल उपयोग संरचना का निर्माण

वनीकरण

डीवीसी ने अपने वनीकरण कार्यक्रम के द्वारा लगभग 2,00,000 हेक्टेयर वन तथा बंजर भूमि को वन के अंदर आवृत्त किया है ।

 

जल विभाजक प्रबंधन

 

जल विभाजक प्रबंधन एक ऐसी गतिविधि है जिसके द्वारा डीवीसी प्रकृति के संवेदी पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखने में मदद करता है । ऊपरी घाटी में विशेषकर मृदा अपरक्षण तथा मृदा अपरदन का सामना करने तथा बाँधों का जीवन बनाये रखने जैसे विषय डीवीसी के महत्वपूण कार्य हैं ।

 

जल विभाजन प्रबंधन के माध्यम अपनायी गयी विभिन्न पद्धतियाँ ने डीवीसी जलागारों की जीवन सीमा संरक्षित रखने में महती भूमिका निभा रही है । पूर्व संरक्षण अवस्था की तुलना में तलछट बनने में 50% की कमी आयी है । तलछटीकरण में 7.9 हेक्टेयर मीटर/100 स्कावयर किलो मीटर प्रति वर्ष की तुलना में 3.20 हेक्टेयर मीटर/100 स्कवायर किलो मीटर तक प्रति वर्ष कमी आयी है ।

 

पंचेत बाँध की वार्षिक तलछटीकरण दर 0.2% से घटकर 2% तक तथा मैथन में 1.35% से घटकर 1.5% तक हो गयी है ।

 

भू-संरक्षण पर अनुसंधान व प्रशिक्षण

 

डीवीसी के 142 हेक्टेयर भू-संरक्षण प्रयोगशाला केन्द्र ने जलवायु, क्षरण, वाहिका तथा मृदा हानि पर एक डेटा बैंक का सृजन किया है । यह कृषि विज्ञान, घास विज्ञान, वनीकरण तथा फल फसल को आवृत्त करते हुए भूमि पर भी अनुसंधान संचालित करता है । भूमि के इष्टतम उपयोग के लिए मृदा तथा जल संरक्षण के प्रभावी तथा मितव्ययी तकनीकों को उपयोग में लाया जाता है । मृदा का अनुसंधान आधारित पहल के साथ डीवीसी की मृदा प्रशिक्षण प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता है ।

 

डीवीसी की पुरोध भूमिका तथा विशेषज्ञता की प्रशंसा करते हुए, भारत सरकार, हजारीबंग में एक भू-संरक्षण केन्द्र चलाने के लिए आर्थिक साहाय्य प्रदान करती है । यह केन्द्र विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा भेजे गये परियोजना तथ क्षेत्र स्तरीय अधिकारियों एवं स्थानीय किसानों को प्रशिक्षण प्रदान करता है ।